अब वो ज़माना ना रहा

अब ऐतबार का वो ज़माना ना रहा
किसी के प्यार को आजमाना ना रहा
बिताई जाती थी जिंदगानिया कभी यादों पर
प्यार में जां निसार का कोई अफसाना ना रहा

Corona times

हर शख्स यहां आजकल
जानकर भी अनजाना क्यो है
कल तक ढुंढता था जिनको
उन अपनो से बेगाना क्यो है

हसी के ठहाके लगते थे जहां कभी
मातम का वहा आज ठिकाना क्यो है
किस्से सुनते थे जिन गलियारों मे कभी
लगता आजकल वहा वीराना क्यो है

कहते थे चार लोगों में अपना जिसे
बंद घर उसके आज जाना क्यो है
कल तक करता था फिक्र जो जमाने की
खुदसे हि लगता उसे आज ज़माना क्यो है

कुछ यादें अपनी सी

वो चाय कि चुस्कियां, साथ बाते दिलो की
वो चौबारे पर बैठना, जुडी है यादे जिनकी

रातो का वो जगना, अलार्म लगा सोना
ख्वाबों मे खोकर, नींद का ना खुलना

कुछ अपनीसी है, कुछ अपनोसे है
इक तार सी जुड़ी, उन सपनो से है

वो जो कुछ लम्हे थे, जो रूकते थे नही
आज कुछ लम्हे है, जो कटते से नही

सपनों का जहां

भीड़ से इस दुर कही
इक छोटा आशियाना हो
इक बहता झरना हो
पास उसके ठिकाना हो

किलबिल हो पंछियों की
नाचता मयुर दिवाना हो
सब सृष्टि लगे घर जैसी
कुछ पशुओं का भी आना हो

चिड़ियों की धुन जगाये
रात का छत ठिकाना हो
तारो कि चादर चमके
चांद की बाहों में सोना हो