किसी के प्यार में यूं
मर मिट के चला
जिस्म उसका जला
पर दिल ना जला

Poetry, Shayari and Gazals
किसी के प्यार में यूं
मर मिट के चला
जिस्म उसका जला
पर दिल ना जला
जुबान थक गई मेरी
समझाते समझाते
लगता है तुम में
समझ की ही कमी है
वो चला गया कुछ ऐसा
जैसा अंधेरे का जुगनू है
अब राख यूं कुरेद रहे हो
क्या दिल कि जुस्तजू है
अब ऐतबार का वो ज़माना ना रहा
किसी के प्यार को आजमाना ना रहा
बिताई जाती थी जिंदगानिया कभी यादों पर
प्यार में जां निसार का कोई अफसाना ना रहा
हर शख्स यहां आजकल
जानकर भी अनजाना क्यो है
कल तक ढुंढता था जिनको
उन अपनो से बेगाना क्यो है
हसी के ठहाके लगते थे जहां कभी
मातम का वहा आज ठिकाना क्यो है
किस्से सुनते थे जिन गलियारों मे कभी
लगता आजकल वहा वीराना क्यो है
कहते थे चार लोगों में अपना जिसे
बंद घर उसके आज जाना क्यो है
कल तक करता था फिक्र जो जमाने की
खुदसे हि लगता उसे आज ज़माना क्यो है
वो चाय कि चुस्कियां, साथ बाते दिलो की
वो चौबारे पर बैठना, जुडी है यादे जिनकी
रातो का वो जगना, अलार्म लगा सोना
ख्वाबों मे खोकर, नींद का ना खुलना
कुछ अपनीसी है, कुछ अपनोसे है
इक तार सी जुड़ी, उन सपनो से है
वो जो कुछ लम्हे थे, जो रूकते थे नही
आज कुछ लम्हे है, जो कटते से नही
भीड़ से इस दुर कही
इक छोटा आशियाना हो
इक बहता झरना हो
पास उसके ठिकाना हो
किलबिल हो पंछियों की
नाचता मयुर दिवाना हो
सब सृष्टि लगे घर जैसी
कुछ पशुओं का भी आना हो
चिड़ियों की धुन जगाये
रात का छत ठिकाना हो
तारो कि चादर चमके
चांद की बाहों में सोना हो