कुछ ऐसा किया जाये

जिंदगी के मुसाफिर है सब यहां
क्यो ना इक दुसरे को रास्ता दिखाया जाये
जाना ही है गर दो दिनों का बसेरा कर के
क्यो ना फिर यादों में रहकर मुस्कुराया जाये

ख़ुद ही खुद को संभालना है

जिम्मेदारीयो का बोझा लिए सिर पर
हालात में किसी भी बसर हो जाना है
नुमाइश पसंद नही है हमें इन गमों की
रोना हैं पर आंसू भी नज़र नहीं आना है