मैं उम्मीद देखता हूं

समंदर में जीने की तहज़ीब देखता हूं
मै उगते सुरज में हर रोज उम्मीद देखता हूं

ये मुश्किलातो के दौर आज के तो नहीं
मैं ख्वाबों में भी अपनी मंजिलें करीब देखता हूं

लड़ना है तो अकेले और निहत्थे ही सही
मैं गर लडु जी जान से तो हार में भी जीत देखता हूं

ये रास्तों के पत्थर और कांटे मेरे दोस्त तो नहीं
मैं उनमें भी हौंसला बढ़ाने का हुनर अजीब देखता हूं

इन हाथों की लकीरों में कब तक रहे उलझकर
मै आज के कर्मो में ही कल का नसीब देखता हूं

-Rarebiologist Quotes

शायद ऐसा तो नहीं

ख्वाब ही में तो जिए जा रहे हैं
ये कोई हकीकत तो नहीं

वो दूर ही तो है कही उसे
पास आने की इजाजत तो नहीं

मानते हैं जिसको हमनवां अपना
वो कोई खूबसूरत मुसीबत तो नहीं

शीशा हमेशा साफ ही दिखाता है
तुम्हारा पर्दे से मतलब‌ तो नहीं

इस जुनून का क्या किया जाये
ये बन रहा अब मेरी आदत तो नहीं

जिंदगी गुजर गई इक हवा के झोंके सी
चाहिए थी वक्त की थोड़ी सी मोहलत तो नहीं

-Rarebiologist Quotes

ऐसा ही सही

जिन्दगी कुछ कम दे तो कम ही सही
ज्यादा गर ख़ुशी ना दे तो ग़म ही सही

वक्त कहां किसका गुलाम बन बैठा है
कल भी था किसी पर आज हम ही सही

कल खूब हंस लिए थे हम जी खोलकर
आज हो ये आंखे नम तो नम ही सही

किन-किन जख्मों को लगाया जाए मरहम
ना मिले मरहम तो अब बेमरहम ही सही

दौड़कर लगती है थकान भी कभी पर
रुकेंगे नहीं चलेंगे इक इक कदम ही सही

यही दौर के अफसाने सुनने आयेंगे वो
आज भले लड़ रहे हो अकेले सिर्फ हम ही सही

ये मुकद्दर कोई पत्थर की लकीर तो नहीं
नहीं बदलेगा इस मौसम तो अगले मौसम ही सही

-Rarebiologist Quotes

आदतों के गुलाम

ये कैसी आदतों के बनकर गुलाम बैठे हो
बेदिल जिस्म वाली बनकर अवाम बैठे हो

हकीकत से हरदम करते हो यूं पर्दा
करके सब कुछ अपना निलाम बैठे हो

यहीं चलता आया है यही चलता रहेगा
कहकर ऐसा फरमाते आराम बैठे हो

थोड़ी सी तो कीमत रखते खुद की भी
बस करते हुए सबको सलाम बैठे हो

वो हो रहे हैं मशहूर न करके कुछ भी
तुम सब कुछ करके यूं बेनाम बैठे हो

दुसरो की नजरों में खोजते रहे खुद को
क्या वक्त हैं आज कहीं गुमनाम बैठें हो

-Rarebiologist Quotes

क्यो ना ऐसा किया जाये

कोई बुझा गया है दिये शायद
क्यो ना फिर से इन्हे जलाया जाये

अपने होकर अनजान से बैठे है
क्यो‌ ना फिर से इन्हे मिलाया जाये

नाराजगी को चाहिए ही कोई ठिकाना
क्यो ना इसे प्यार में घुलाया जाये

ये कैसी दिवारो से घीरे पड़े हैं
क्यो ना तोड़कर बाहर आया जाये

इंसान से इंसान का भले बैर कैसा
क्यो ना परायो को भी गले लगाया जाये

जिंदगी के मुसाफिर है हम सब यहां
क्यो ना इक दुसरे को रास्ता दिखाया जाये

जाना ही है गर दो दिनों का बसेरा कर के
क्यो ना यादों में रहकर मुस्कुराया जाये

ये नजारे बदले सें

इन जानी सी राहों के कुछ नजारे है बदलें से     
आंखें हैं ये धुंधली या नज़ारे है धुंधले से

बेबाक से चलते थे कभी इन्हीं राहों पर
आजकल हम हैं संभाले या खुद ही संभले से

मंजिलों तक क्या जाती है यह राह मेरी
रास्तों के मंज़र भी ये कुछ लगते है‌ बदले बदले से

मुसाफिरों का कहां रहता है यहां ठिकाना
राह दिखे जिधर हम जाते है चले चले से

जिस से भी मिलते हैं कहता है हम से वो
आज कल तुम नहीं लग रहे हो वो पहले से

नापते रहते हे गहराई

नापते रहते हैं गहराई यूं ही पत्थर फेंककर
दरियाओ की आदत है शायद उन्होंने समंदर नहीं देखा

यहा तो मिलते हैं उनको लाखों मुसाफिर राहों में
रास्ता बताएं दिल का शायद ऐसा रहबर नहीं देखा

कटता ही है रास्ता चाहे साथ कोई भी चले
सफर का मजा दे ऐसा उन्होंने हमसफर नहीं देखा

सुर्ख़ियों में ही मुफलिसी से रहा है उनका वास्ता शायद
गुरबत में इक लम्हा भी उन्होंने गुजारकर नहीं देखा

आसमान और तारों को ही वो देखते रहे दिन रातभर
चांद सा दिल लिए बैठे थे हम उन्होंने इक नजर नहीं देखा