ये नजारे बदले सें

इन जानी सी राहों के कुछ नजारे है बदलें से     
आंखें हैं ये धुंधली या नज़ारे है धुंधले से

बेबाक से चलते थे कभी इन्हीं राहों पर
आजकल हम हैं संभाले या खुद ही संभले से

मंजिलों तक क्या जाती है यह राह मेरी
रास्तों के मंज़र भी ये कुछ लगते है‌ बदले बदले से

मुसाफिरों का कहां रहता है यहां ठिकाना
राह दिखे जिधर हम जाते है चले चले से

जिस से भी मिलते हैं कहता है हम से वो
आज कल तुम नहीं लग रहे हो वो पहले से

नापते रहते हे गहराई

नापते रहते हैं गहराई यूं ही पत्थर फेंककर
दरियाओ की आदत है शायद उन्होंने समंदर नहीं देखा

यहा तो मिलते हैं उनको लाखों मुसाफिर राहों में
रास्ता बताएं दिल का शायद ऐसा रहबर नहीं देखा

कटता ही है रास्ता चाहे साथ कोई भी चले
सफर का मजा दे ऐसा उन्होंने हमसफर नहीं देखा

सुर्ख़ियों में ही मुफलिसी से रहा है उनका वास्ता शायद
गुरबत में इक लम्हा भी उन्होंने गुजारकर नहीं देखा

आसमान और तारों को ही वो देखते रहे दिन रातभर
चांद सा दिल लिए बैठे थे हम उन्होंने इक नजर नहीं देखा

ख़ुद ही खुद को संभालना है

जिम्मेदारीयो का बोझा लिए सिर पर
हालात में किसी भी बसर हो जाना है
नुमाइश पसंद नही है हमें इन गमों की
रोना हैं पर आंसू भी नज़र नहीं आना है

क्या फुलों से भी जख्म पाये हो

यूं संभल कर चलते हो राहों में
जैसै कोई नई राह अपनाये हो
फुलों से भी दूर से गुजरते हो आजकल
क्या इन फुलों से भी जख्म पाये हो